डॉ. अजय कुमार ओझा की यह पुस्तक, 'थारू' नामक एक आदिवासी समुदाय के साथ उनके लगभग पाँच दशकों के निरंतर जुड़ाव का परिणाम है। यह जुड़ाव मुख्य रूप से बिहार (भारत) के पश्चिमी चंपारण जिले के अत्यंत दुर्गम भूभाग में किए गए 'क्षेत्रीय अध्ययन' (Fieldwork) की 'सहभागी या प्रतिभागी अवलोकन अनुसंधान तकनीक' (Participant Observation Research Technique) पर आधारित है। यह क्षेत्र नेपाल की सीमा से सटा हुआ है और 20वीं सदी में 'मिनी चंबल' तथा 'लाल सलाम क्षेत्र' के रूप में कुख्यात रहा है। डॉ. ओझा इस क्षेत्र के थारू समुदाय को उनके हितों और अधिकारों के लिए संघर्ष करने हेतु संगठित करने में सक्रिय रहे हैं; इन अधिकारों में उनकी संस्कृति की सुरक्षा, तथा वनों और भूमि सहित उनके आवास की सुरक्षा शामिल है। पश्चिमी चंपारण के थारू, जो दशकों तक अपने अधिकारों से वंचित रहे थे, वर्ष 2003 में 'अनुसूचित जनजाति' के रूप में मान्यता प्राप्त करने में सफल हुए। इस उपलब्धि में डॉ. ओझा के निरंतर और दृढ़तापूर्ण प्रयासों को कभी भी नजरअंदाज, उपेक्षित या कम करके नहीं आंका जा सकता । पश्चिमी चंपारण के थारुओं पर लिखी गई यह दुर्लभ पुस्तक, सामाजिक विज्ञान अनुसंधान के क्षेत्र में अपनी तरह की एक अनूठी कृति है। यह पुस्तक न केवल थारू समाज के विभिन्न पहलुओं को (जो वैश्वीकरण की तीव्र प्रक्रिया के कारण विलुप्त होने की कगार पर हैं) दस्तावेजित करती है, बल्कि पांच दशकों तक फैली उनकी यात्रा को भी समेटे हुए है। इस पुस्तक में, कभी अत्यंत उपेक्षित और हाशिए पर रहे इस आदिवासी समाज में आए परिवर्तनों और विकास के क्रम को भी विस्तारपूर्वक दर्शाया गया है। एक अनुभवी प्रसारक होने के साथ-साथ, जिन्होंने 'भारतीय प्रसारण सेवा' के अधिकारी के रूप में भारत के लोक सेवा प्रसारक 'दूरदर्शन' में लगभग तीन दशकों तक सेवाएँ दी हैं डॉ. अजय कुमार ओझा एक अत्यंत निष्ठावान और समर्पित 'सार्वजनिक बुद्धिजीवी' भी रहे हैं। उन्होंने सदैव वंचित समूहों की समस्याओं को उजागर करने का कार्य किया है। यह पुस्तक निश्चित रूप से न केवल सामाजिक वैज्ञानिकों, बुद्धिजीवियों, विद्यार्थियों और आम नागरिकों को प्रेरित करेगी, बल्कि योजनाकारों और नीति-निर्माताओं के लिए एक मार्गदर्शिका, एक संदर्भ-ग्रंथ और एक व्यावहारिक नियमावली के रूप में भी कार्य करेगी।